कहे हो, लिखो "शेर" कागज़ पर, गम निकल जाते हैं,,
हम तो रोज़ लिखते हैं, शेर, तीन-चार निकल आते हैं.
मरासिम था तो यूँ अंजाम ना होना था, छोड़ दो तुम,,
हमारा क्या, हम तो ख्वाबों में आकर भी सताते हैं.
अब भी कूचे, कभी शामियाने में वो सामने आते हैं,,
जब थे तब तो हया थी, अब बेशर्मी से निकल जाते हैं.
लकीरें दिखा के हांथों की बहुत डराया है सबने,,
अब तो खुद खींचते हैं इनको, खुद ही मिटाते हैं.....
लकीरें दिखा के हांथों की बहुत डराया है सबने,,
ReplyDeleteअब तो खुद खींचते हैं इनको, खुद ही मिटाते हैं.....
वाह ...वाह.......क्या बात है .......!!
Thank you .. heer ji
ReplyDeletekhud hi lakeeron ko khinchne aur mitane ke hausle ko pranaam...
ReplyDeletekeep writing!!!