"वो भी खूब दिन थे, जब आते थे खतों के जवाब,
अब खातिब को देखिये, 'वो भी' नज़रें चुराता है.
तड़प रही है ख्वाहिश, अब भी वहीँ तेरे दर पे,
निकले है 'आह', हर शख्स 'वाह' कर जाता है.
मैकदे में मय अब भी है बाकी, जाम पूरा है,
पर, शाम ही कहने लगी है 'वहां' क्यूँ जाता है.
आलम जीस्त में है जुस्तजू का ठीक वैसा ही,
मय 'खूब' पीता हूँ, वो 'खूब' याद आ जाता है"...विवेक
(12th June, 10)
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