बारिश के हर कतरे ने भिगोया आज,
जला मै फिर भी, आग बड़ी थी आब में.
आँखों में गैरों की खूब झाँका है, दोस्त,
अब खुद को लेकर खड़ा हूँ नए बाज़ार में.
सफ़र से ही है लाग अब, मुद्दत हो गई,
जी नहीं लगता है मंजिल की तलाश में.
जब भी देखेगा आइना कुछ मलाल होगा,
कहीं ख़ाक न हो जाए तू उस ख़याल में... विवेक
(7th July, 10)
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