अरमां कई जलें तब जा के दीवान किये,,
हम रोये नहीं, जज्बातों को बस नाम दिए.
अजी हम जीते तब भी थे, जीते अब भी हैं,,
चीज़ बदली इतनी, ख्वाब नए अंजाम दिए.
उन्हें थी शिकायत, कुछ न दे पायें हम,,
क्या दे दें ? अपने सुबह दिए-शाम दिए.
मरासिम में कुछ चूकने सा था हैफ,,
सुना के किस्से 'दोस्तों' ने दर्द तमाम दिए......विवेक
(दीवान=किताब, मरासिम=रिश्ते, हैफ=अफ़सोस)
(17th June, 10)
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