कँवल के फूल वहां मुरझाने लगे हैं,,
मत जाओ कीचड़ में, दोस्त डराने लगे हैं.
फंसे रहो जीत के तमगे, हार कि खलिश में,,
सवाल तो अब 'जंग' पे उठ के आने लगे हैं.
बहस 'भूख' पे भी होनी चाहिए यहाँ लोगों,,
इस तंगी-ए-दिल से सब तंग आने लगे हैं.
तुम क्या, तुम्हारा नखचीर क्या है जी ?
'शिकार' तो यहाँ खुद का खाने लगे हैं.
खबर है, कोई हादसा मुंह खोले हुए है,,
देखो इन्हें, सिर्फ ये खबर दबाने लगे हैं....
Wednesday, July 28, 2010
Sunday, July 25, 2010
.....बेशर्मी से निकल जाते हैं.
कहे हो, लिखो "शेर" कागज़ पर, गम निकल जाते हैं,,
हम तो रोज़ लिखते हैं, शेर, तीन-चार निकल आते हैं.
मरासिम था तो यूँ अंजाम ना होना था, छोड़ दो तुम,,
हमारा क्या, हम तो ख्वाबों में आकर भी सताते हैं.
अब भी कूचे, कभी शामियाने में वो सामने आते हैं,,
जब थे तब तो हया थी, अब बेशर्मी से निकल जाते हैं.
लकीरें दिखा के हांथों की बहुत डराया है सबने,,
अब तो खुद खींचते हैं इनको, खुद ही मिटाते हैं.....
हम तो रोज़ लिखते हैं, शेर, तीन-चार निकल आते हैं.
मरासिम था तो यूँ अंजाम ना होना था, छोड़ दो तुम,,
हमारा क्या, हम तो ख्वाबों में आकर भी सताते हैं.
अब भी कूचे, कभी शामियाने में वो सामने आते हैं,,
जब थे तब तो हया थी, अब बेशर्मी से निकल जाते हैं.
लकीरें दिखा के हांथों की बहुत डराया है सबने,,
अब तो खुद खींचते हैं इनको, खुद ही मिटाते हैं.....
Saturday, July 24, 2010
... ये बिल्कुल 'यार' है
तेरे "इंतज़ार" पे ऐतबार नहीं होता,,
जब से जाना है , ये तेरा रोज़गार है.
टुकड़ा एक याद का रख, अलग सोया था,,
ख्वाबों में रुलाता है, ये बिल्कुल 'यार' है.
हाथ से निकाल, कलेजा रक्खा था बार-बार,,
सीने में लिए फिरे हो दिल, कहते हो 'प्यार' है !
चिलमन के पीछे से, झुक के वो देखे,,
अब तो दिल इसी 'नज़र' को बेक़रार है.
जब से जाना है , ये तेरा रोज़गार है.
टुकड़ा एक याद का रख, अलग सोया था,,
ख्वाबों में रुलाता है, ये बिल्कुल 'यार' है.
हाथ से निकाल, कलेजा रक्खा था बार-बार,,
सीने में लिए फिरे हो दिल, कहते हो 'प्यार' है !
चिलमन के पीछे से, झुक के वो देखे,,
अब तो दिल इसी 'नज़र' को बेक़रार है.
Friday, July 23, 2010
...तुझे दम दिखता हूँ.
थोडा खामोश क्या हुआ, खुश ही हो गए,,
दम ले रहा हूँ, ठहर तुझे दम दिखाता हूँ.
कीमत तू क्या चुकाएगा, तेरा ऐतबार क्या?
जमीन खिसकेगी, कहा जो हिसाब दिखाता हूँ.
'दरमयां' देख नाखुश हुआ, कहा था न !
कदम बढ़ा, बाकी चल के मै दिखाता हूँ.
हंसी को ओढ़ लेता है हिजाब की तरह,,
मै तो हमेशा कलेजा चीर के, दिखाता हूँ.
दम ले रहा हूँ, ठहर तुझे दम दिखाता हूँ.
कीमत तू क्या चुकाएगा, तेरा ऐतबार क्या?
जमीन खिसकेगी, कहा जो हिसाब दिखाता हूँ.
'दरमयां' देख नाखुश हुआ, कहा था न !
कदम बढ़ा, बाकी चल के मै दिखाता हूँ.
हंसी को ओढ़ लेता है हिजाब की तरह,,
मै तो हमेशा कलेजा चीर के, दिखाता हूँ.
Tuesday, July 20, 2010
...उलझाने में लगा हूँ
उलझनों को और उलझाने में लगा हूँ,,
पास? अरे मै तो दूर जाने में लगा हूँ.
ख्वाबों से रु-ब-रु हुए मुद्दत हो गई,,
अभी खयालातों को सँभालने में लगा हूँ.
बड़ा इतरा के कहता है, मै पूछता नहीं,,
मै सवालात जेहन तक लाने में लगा हूँ.
हर चौराहे पर भटकता है, उम्मीद लिए,,
कोई बता दे, मै तेरा पता पाने में लगा हूँ.
(http://www.facebook.com/note.php?saved&&suggest¬e_id=145167602162379)
पास? अरे मै तो दूर जाने में लगा हूँ.
ख्वाबों से रु-ब-रु हुए मुद्दत हो गई,,
अभी खयालातों को सँभालने में लगा हूँ.
बड़ा इतरा के कहता है, मै पूछता नहीं,,
मै सवालात जेहन तक लाने में लगा हूँ.
हर चौराहे पर भटकता है, उम्मीद लिए,,
कोई बता दे, मै तेरा पता पाने में लगा हूँ.
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Friday, July 16, 2010
मै मैखाना बदल गया...
वक़्त ने थोड़ी नज़र क्या हटाई,
उनकी आँखों में चुभने लग गया...
कभी खुश होते थे देख कर वो,
अब मै हंसी का सबब बन गया...
एक ही साकी, एक ही प्याला था,
देखो उसे, वो मैखाना बदल गया...
ग़लतफ़हमी मत रख, मै चलूँगा,
तेरी मंजिल और, मै रास्ता बदल गया... विवेक
उनकी आँखों में चुभने लग गया...
कभी खुश होते थे देख कर वो,
अब मै हंसी का सबब बन गया...
एक ही साकी, एक ही प्याला था,
देखो उसे, वो मैखाना बदल गया...
ग़लतफ़हमी मत रख, मै चलूँगा,
तेरी मंजिल और, मै रास्ता बदल गया... विवेक
Wednesday, July 14, 2010
.....एक और बार
डूब जाता है दिल, भर आती हैं आँखे मेरी,,
जब भी दरिया में यादों की, पड़ती है दरार....
खुशनसीब हो जो रुलाता है अभी दर्द तुमको,,
मैं तो हंसने लगा हूँ देख ये दर-ओ-दिवार....
बंद कर के सभी दरवाज़े खामोश बैठा था,,
सुना है, दर पे आई है फिर एक बहार....
निकले है आग, जब भी दिल की सोंचता हूँ,,
फिर भी कमबख्त कहता है, एक और बार......विवेक
जब भी दरिया में यादों की, पड़ती है दरार....
खुशनसीब हो जो रुलाता है अभी दर्द तुमको,,
मैं तो हंसने लगा हूँ देख ये दर-ओ-दिवार....
बंद कर के सभी दरवाज़े खामोश बैठा था,,
सुना है, दर पे आई है फिर एक बहार....
निकले है आग, जब भी दिल की सोंचता हूँ,,
फिर भी कमबख्त कहता है, एक और बार......विवेक
Tuesday, July 13, 2010
...वहां से एक मोड़ है.
रास्ते में आ भी जा, कोई फिक्र नहीं,,
खुद से अब आगे निकलने की होड़ है.
यहाँ से ये गली बंद सी दिखती होगी,,
जरा आगे बढ़, वहां से एक मोड़ है.
कहते हो आँखे खामोश है तुम्हारी,,
मैंने देखा, वहां एक अजीब शोर है.
निगाहें लेकर भागते देखा तुमको,,
ज़ाहिर है दिल में तुम्हारे चोर है.
कोशिश कर रहा है तो रोता क्यूँ है?
एक काम कर, बाकी को दिन और है.
(10th July, 10)
खुद से अब आगे निकलने की होड़ है.
यहाँ से ये गली बंद सी दिखती होगी,,
जरा आगे बढ़, वहां से एक मोड़ है.
कहते हो आँखे खामोश है तुम्हारी,,
मैंने देखा, वहां एक अजीब शोर है.
निगाहें लेकर भागते देखा तुमको,,
ज़ाहिर है दिल में तुम्हारे चोर है.
कोशिश कर रहा है तो रोता क्यूँ है?
एक काम कर, बाकी को दिन और है.
(10th July, 10)
...आग बड़ी थी आब में
बारिश के हर कतरे ने भिगोया आज,
जला मै फिर भी, आग बड़ी थी आब में.
आँखों में गैरों की खूब झाँका है, दोस्त,
अब खुद को लेकर खड़ा हूँ नए बाज़ार में.
सफ़र से ही है लाग अब, मुद्दत हो गई,
जी नहीं लगता है मंजिल की तलाश में.
जब भी देखेगा आइना कुछ मलाल होगा,
कहीं ख़ाक न हो जाए तू उस ख़याल में... विवेक
(7th July, 10)
जला मै फिर भी, आग बड़ी थी आब में.
आँखों में गैरों की खूब झाँका है, दोस्त,
अब खुद को लेकर खड़ा हूँ नए बाज़ार में.
सफ़र से ही है लाग अब, मुद्दत हो गई,
जी नहीं लगता है मंजिल की तलाश में.
जब भी देखेगा आइना कुछ मलाल होगा,
कहीं ख़ाक न हो जाए तू उस ख़याल में... विवेक
(7th July, 10)
...चेहरे पर दिल उतर आया था.
आईने में दिखा कल दर्द बहुत ज्यादा,,
रात, चेहरे पर दिल उतर आया था.
किस्मत से नींद तक जाती हैं आँखे,,
रात, फिर ख्वाब वहां से लौट आया था.
फिर के आता है फिर 'वही' सा ख्याल,,
रात कहती है, काफ़िर पे दिल आया था.
क्यूँ कर कहा उसने मैखाना बंद हो गया,,
रात, मैंने देखा वही साकी यहाँ आया था.
यकीन करूँ तो किस पे, हाल ये है ,,
दिन में 'रात' से डर के मै आया था...Vivek
(4th July, 10)
रात, चेहरे पर दिल उतर आया था.
किस्मत से नींद तक जाती हैं आँखे,,
रात, फिर ख्वाब वहां से लौट आया था.
फिर के आता है फिर 'वही' सा ख्याल,,
रात कहती है, काफ़िर पे दिल आया था.
क्यूँ कर कहा उसने मैखाना बंद हो गया,,
रात, मैंने देखा वही साकी यहाँ आया था.
यकीन करूँ तो किस पे, हाल ये है ,,
दिन में 'रात' से डर के मै आया था...Vivek
(4th July, 10)
....सितमगर को प्यार
तुमने दर्दोगम ख्वाब में देखा होगा, हाँ,,
मैंने टूटे ख्वाब पे हुए हर वार को देखा है.
कहते रहो सितम बहुत झेले हैं तुमने,,
हमने सितमगर को प्यार कर देखा है.
जब कुछ था ही नहीं तो बेवफा हम कैसे?
कभी अपने जेहन में तुमने झाँक के देखा है.
पहले ही मोड़ से मुड़ गया करीने से,,
मैंने ऐसा हमसफ़र अपने साथ देखा है.....विवेक
(27th June, 10)
मैंने टूटे ख्वाब पे हुए हर वार को देखा है.
कहते रहो सितम बहुत झेले हैं तुमने,,
हमने सितमगर को प्यार कर देखा है.
जब कुछ था ही नहीं तो बेवफा हम कैसे?
कभी अपने जेहन में तुमने झाँक के देखा है.
पहले ही मोड़ से मुड़ गया करीने से,,
मैंने ऐसा हमसफ़र अपने साथ देखा है.....विवेक
(27th June, 10)
हँसना मजबूरी है...
हँसना मजबूरी है, दर्द ने इतना निचोड़ा है,,
खुश हों लूँ खूब फिर भी आंसू नहीं निकलते.
जज्बातों का बोझ खुद पे पड़ रहा भारी बहुत,,
खूब कोशिश कर लूँ, लफ्ज़ हर बार नहीं मिलते.
वो नज़र अंदाज़ करता है बड़े अंदाज़ से लोगों,,
टीस होती है, मालूम नहीं किस बात के चलते.
कब तक छिपाओगे इश्क, कब तक सहमे रहोगे,,
खुद में खो जाऊंगा कहीं, रह जाओगे हाथ मलते.....Vivek
(25th June, 10)
खुश हों लूँ खूब फिर भी आंसू नहीं निकलते.
जज्बातों का बोझ खुद पे पड़ रहा भारी बहुत,,
खूब कोशिश कर लूँ, लफ्ज़ हर बार नहीं मिलते.
वो नज़र अंदाज़ करता है बड़े अंदाज़ से लोगों,,
टीस होती है, मालूम नहीं किस बात के चलते.
कब तक छिपाओगे इश्क, कब तक सहमे रहोगे,,
खुद में खो जाऊंगा कहीं, रह जाओगे हाथ मलते.....Vivek
(25th June, 10)
अरमां कई जलें.....
अरमां कई जलें तब जा के दीवान किये,,
हम रोये नहीं, जज्बातों को बस नाम दिए.
अजी हम जीते तब भी थे, जीते अब भी हैं,,
चीज़ बदली इतनी, ख्वाब नए अंजाम दिए.
उन्हें थी शिकायत, कुछ न दे पायें हम,,
क्या दे दें ? अपने सुबह दिए-शाम दिए.
मरासिम में कुछ चूकने सा था हैफ,,
सुना के किस्से 'दोस्तों' ने दर्द तमाम दिए......विवेक
(दीवान=किताब, मरासिम=रिश्ते, हैफ=अफ़सोस)
(17th June, 10)
हम रोये नहीं, जज्बातों को बस नाम दिए.
अजी हम जीते तब भी थे, जीते अब भी हैं,,
चीज़ बदली इतनी, ख्वाब नए अंजाम दिए.
उन्हें थी शिकायत, कुछ न दे पायें हम,,
क्या दे दें ? अपने सुबह दिए-शाम दिए.
मरासिम में कुछ चूकने सा था हैफ,,
सुना के किस्से 'दोस्तों' ने दर्द तमाम दिए......विवेक
(दीवान=किताब, मरासिम=रिश्ते, हैफ=अफ़सोस)
(17th June, 10)
....'वो भी' नज़रें चुराता है.
"वो भी खूब दिन थे, जब आते थे खतों के जवाब,
अब खातिब को देखिये, 'वो भी' नज़रें चुराता है.
तड़प रही है ख्वाहिश, अब भी वहीँ तेरे दर पे,
निकले है 'आह', हर शख्स 'वाह' कर जाता है.
मैकदे में मय अब भी है बाकी, जाम पूरा है,
पर, शाम ही कहने लगी है 'वहां' क्यूँ जाता है.
आलम जीस्त में है जुस्तजू का ठीक वैसा ही,
मय 'खूब' पीता हूँ, वो 'खूब' याद आ जाता है"...विवेक
(12th June, 10)
अब खातिब को देखिये, 'वो भी' नज़रें चुराता है.
तड़प रही है ख्वाहिश, अब भी वहीँ तेरे दर पे,
निकले है 'आह', हर शख्स 'वाह' कर जाता है.
मैकदे में मय अब भी है बाकी, जाम पूरा है,
पर, शाम ही कहने लगी है 'वहां' क्यूँ जाता है.
आलम जीस्त में है जुस्तजू का ठीक वैसा ही,
मय 'खूब' पीता हूँ, वो 'खूब' याद आ जाता है"...विवेक
(12th June, 10)
......तमाम' हम भी हर बार हो गए.
"उनको भूलने की कोशिशें हुई 'तमाम',
'तमाम' हम भी हर बार हो गए.
याद आती है अब भी वो सुबहो-शाम
जो भी थे वो सब तार-तार हो गये.
इसी उम्मीद में की हम होंगे एक,
यकीं मानिए, हम सौ बार हो गए.
चले ही गए कुछ कहा भी नहीं,
हम कब से इतने बेज़ार हो गए?
अब गम नहीं किसी के जाने का,
हम तो शायरों में शुमार हो गए.."...विवेक
(9th June, 10)
'तमाम' हम भी हर बार हो गए.
याद आती है अब भी वो सुबहो-शाम
जो भी थे वो सब तार-तार हो गये.
इसी उम्मीद में की हम होंगे एक,
यकीं मानिए, हम सौ बार हो गए.
चले ही गए कुछ कहा भी नहीं,
हम कब से इतने बेज़ार हो गए?
अब गम नहीं किसी के जाने का,
हम तो शायरों में शुमार हो गए.."...विवेक
(9th June, 10)
एक ही दिन....
"एक ही दिन में हमने क्या हद कर दी ?
एक ही दिन में वो छिप के जाने लगें.
एक ही दिन में हमने क्या-क्या सोंचा था,
एक ही दिन में ये क्या नज़ारे आने लगें.
एक ही दिन में की नज़र-इ-इनायत,
एक ही दिन में आँख दिखने लगें.
एक ही दिन में चेहरा करीब था,
एक ही दिन में वो मुंह चिढाने लगें." ... विवेक
(4june, 10)
एक ही दिन में वो छिप के जाने लगें.
एक ही दिन में हमने क्या-क्या सोंचा था,
एक ही दिन में ये क्या नज़ारे आने लगें.
एक ही दिन में की नज़र-इ-इनायत,
एक ही दिन में आँख दिखने लगें.
एक ही दिन में चेहरा करीब था,
एक ही दिन में वो मुंह चिढाने लगें." ... विवेक
(4june, 10)
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