महफ़िल-ए-कुमार
Friday, October 24, 2014
मैं दिए जला रहा हूं .....
अंधेरे की तलवारों से उजाला चीरा नहीं जा सकता...
दिए के जलते ही अंधेरा खाक हो जाता है। राख उससे काली हो सकती है लेकिन फैल नहीं सकती। तुम धुएं उडाते रहो,
मैं दिए जला रहा हूं .....
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