Saturday, April 7, 2012

शाम देखा है खबर बिकते, सुबह अखबार.....

कुछ इस तरह आता है मेरे हिस्से में प्यार,
जैसे बिखरे हुए किस्से में खोया हो किरदार.
 
अब इन कागजों पे भरोसा हो तो कैसे ?
शाम देखा है खबर बिकते, सुबह अखबार.
 
मुंसिफ की दुकान पे भी लगती हैं बोलियाँ.
सुबूत दब गए हैं, जिरह में बिक गया बाज़ार.
 
सजा के दरबार बैठी खामोश क्यूँ है दिल्ली ?
संगीने  खिंच गई हैं, क्या मुकाबिल है सरकार ?
 
सियासी बयानों में उलझा के मुल्क को 'कुमार',
रोज़ लूटा जा रहा है हर शख्स का ऐतबार......

4 comments:

  1. bahot UMDA vivek

    --Chaitali

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  2. dhaansu hai bhaijaan... kaafi gehraayee hai.. :) caputured the essence of the present scenario to perfection !

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  3. really last line is aweksome..accha likh letey ho.

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