Wednesday, September 1, 2021

"नफरत"

 नफरत बहुत भारी होती है

आपके वजूद पर लटक जाती है

बटखरा बनकर

आपको हल्का कर देती 

जिंदगी के तराजू पर 

 

इस भार से जंजीर बनती है

जिससे सोच जकड़ जाती है

यह ईर्ष्या और लोभ से भी पैनी है

चुभती है थोड़ा सामने

ज्यादा खुद में


आपमें सिर्फ राख बचती है

ये तंदूर पेट नहीं भरता

पानी कर देता है खून को

खौलता रहता है दिन-रात

आप बस भाप की तरह उड़ जाते हैं

सिर्फ कहीं बरसने के लिए

Wednesday, May 13, 2020

सच

बातों का अपना जाल है,
बुनते रहते हैं कुछ लोग,
सच के नाम पे, तर्क के नाम पे,
तर्कों के ताने-बाने में खुद को पिरो कर,
सच के प्रकार बताए जाते हैं,
एक मेरा सच और एक तुम्हारा वाला,
ये जाल जानलेवा है, 
क्योंकि सच के पहलू नहीं होते,
तर्कों की अपनी औकात होती है,
उसे मरोड़ा-तोड़ा जाता है,
फिर "सच्चाई" पनपती है,
झूठ की नींव से, नफरत-लोभ लपेटे हुए,
फिर खड़ा होता है "सच", 
अडिग,
सच का रूप नहीं होता,
ये निर्गुण है, कबीर की तरह.... ©️ (विवेक)

Monday, March 30, 2020

"एकांत"

शोर थम गया है तुम्हारा

सिर्फ मैं ही हूं आसपास मेरे

अंधकार और प्रकाश के कहीं बीच

जहां परछाइयां भी नहीं बनती

इंद्रधनुष भी मिरिचिका नहीं बनाते

समय मौन हो जाता है

असली-नकली से बहुत दूर

शोर-शांति से आगे

एकांत के आनंद में....

Friday, August 2, 2019

उड़ रहा हूं अंदर...

आसमान में फूल नहीं खिलते पर,
सुगंध फिजाओं में घुल कर नीली हो जाती है,
उम्र को मैं चल के नहीं जीता,
ठहराव भी नहीं है मील के पत्थरों पर,
मुस्कुराते हुए उड़ रहा हूं अंदर...और अंदर..."कुमार"

बात इतनी अंदर गई है...

अब उम्र सिलवटों में सिमट गई है,
अभी-अभी जिंदगी लिपट के गई है.

जायका आंखों में तेरे हुस्न का है,
जब से देखा है तबीयत बिगड़ गई है.

रो-रो के उसने नमी इतनी कर ली,
दिल के किवाड़ में लकड़ी जम गई है.

रूह तक छाले ही छाले हैं
यकीनन बात इतनी अंदर गई है.

..."कुमार"

Tuesday, January 22, 2019

...क्योंकि मुस्कुराहट की उम्र नहीं होती



फूल खिल कर मुरझा सकते हैं, सूरज शाम की दहलीज पर ढल सकता है,
इरादे मंजिल से पहले थक सकते हैं,
वक्त इन सबको समेट सकता है,
लेकिन, तुम मुस्कुराती रहना...,
मुस्कुराहट जज्बातों को रूह से जोड़ती है,
क्योंकि मुस्कुराहट की उम्र नहीं होती... 'कुमार'

Friday, December 21, 2018

...क्योंकि, भूख की जीभ नहीं होती


आटे का सफेद घोल अश्वत्थामा के लिए दूध बन जाता है,

जंगलों में 'सरगूजे' के दो दानें मिलकर एक दाना 'धान' की बराबरी करते हैं,

अफसोस, चुल्हों से ज्यादा आज भी भूख जल रही है,

आसमान साफ है लेकिन हुकूमत की नीयत नहीं,

हरखुआ फिर खाली पेट सोया है, उससे स्वाद मत पूछो,

क्योंकि, भूख की जीभ नहीं होती... 'कुमार'