Friday, August 2, 2019

उड़ रहा हूं अंदर...

आसमान में फूल नहीं खिलते पर,
सुगंध फिजाओं में घुल कर नीली हो जाती है,
उम्र को मैं चल के नहीं जीता,
ठहराव भी नहीं है मील के पत्थरों पर,
मुस्कुराते हुए उड़ रहा हूं अंदर...और अंदर..."कुमार"

बात इतनी अंदर गई है...

अब उम्र सिलवटों में सिमट गई है,
अभी-अभी जिंदगी लिपट के गई है.

जायका आंखों में तेरे हुस्न का है,
जब से देखा है तबीयत बिगड़ गई है.

रो-रो के उसने नमी इतनी कर ली,
दिल के किवाड़ में लकड़ी जम गई है.

रूह तक छाले ही छाले हैं
यकीनन बात इतनी अंदर गई है.

..."कुमार"

Tuesday, January 22, 2019

...क्योंकि मुस्कुराहट की उम्र नहीं होती



फूल खिल कर मुरझा सकते हैं, सूरज शाम की दहलीज पर ढल सकता है,
इरादे मंजिल से पहले थक सकते हैं,
वक्त इन सबको समेट सकता है,
लेकिन, तुम मुस्कुराती रहना...,
मुस्कुराहट जज्बातों को रूह से जोड़ती है,
क्योंकि मुस्कुराहट की उम्र नहीं होती... 'कुमार'