हर मुकाम पे रास्ते याद आते हैं,
हमसफ़र तो मेरे काफिर ही रहे.
लिखते रहे, मिटा-मिटा के नाम उनका ख़तों पे,
फिर भी इंतज़ार-ए-क़ासिद ही रहे.
तमाम हिस्सों को सी-सी के ज़िन्दगी कर डाली,
हालात से तो नाकामी के हासिल ही रहे.
रोते भी तो हंसने का बहाना कर के,
जज़्बातों में ज़माने के 'ना'काबिल ही रहे.
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