Thursday, August 18, 2016

...इंतज़ार-ए-क़ासिद ही रहे

हर मुकाम पे रास्ते याद आते हैं, 
हमसफ़र तो मेरे काफिर ही रहे.

लिखते रहे, मिटा-मिटा के नाम उनका ख़तों पे,
फिर भी इंतज़ार-ए-क़ासिद ही रहे.

तमाम हिस्सों को सी-सी के ज़िन्दगी कर डाली,
हालात से तो नाकामी के हासिल ही रहे.

रोते भी तो हंसने का बहाना कर के,
जज़्बातों में ज़माने के 'ना'काबिल ही रहे.

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