मैं गली हूं, रोकना मत रास्ता मेरा,
दीवारें देख कर मैं मुड़ने लगता हूं.
कोई जज्बात पकड़ मत खींच लेना हाथों से,
मां का स्वेटर हूं, मैं उघड़ने लगता हूं.
मेरी फितरत भी कुछ पत्तों सी है,
जब भी टूटता हूं, मैं उड़ने लगता हूं.
जब थक जाना तो बस देख भर लेना,
नजर हूं, मैं आंखों से जुड़ने लगता हूं.
कोई लश्कर हो, दूर से गुजार देना दोस्त,
दिल्ली हूं, मैं हर बार उजड़ने लगता हूं.
मेरी अाशिकी को वजह मत देना मेरे हमदम
घास हूं, मैं बेवजह उगने लगता हूं.
मेरी अाशिकी को वजह मत देना मेरे हमदम
घास हूं, मैं बेवजह उगने लगता हूं.

बहुत खूब!
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