Monday, November 9, 2015

मैं गली हूं ....


मैं गली हूं, रोकना मत रास्ता मेरा,
दीवारें देख कर मैं मुड़ने लगता हूं.

कोई जज्बात पकड़ मत खींच लेना हाथों से,
मां का स्वेटर हूं, मैं उघड़ने लगता हूं.

मेरी फितरत भी कुछ पत्तों सी है,
जब भी टूटता हूं, मैं उड़ने लगता हूं.

जब थक जाना तो बस देख भर लेना,
नजर हूं, मैं आंखों से जुड़ने लगता हूं. 

कोई लश्कर हो, दूर से गुजार देना दोस्त,
दिल्ली हूं, मैं हर बार उजड़ने लगता हूं. 

मेरी अाशिकी को वजह मत देना मेरे हमदम
घास हूं, मैं बेवजह उगने लगता हूं. 

Monday, November 2, 2015

गोमांस


अब क्या रात गलियों में गुज़र जाएगी ? दिन तमाशा बन सामने से निकल जायेंगे ? आखिर हर शाम मुद्दों की चौखट पे ये मांस कौन फेंक आता है ?


Friday, August 28, 2015

तूफ़ान भी पिघल के रेत बन जाता है...

तपते हुए रिश्तों पे एहसास का उबलना हो ... या दर्द की जमीन पे ज़ज्बातों का उगना,
...मैं वहां तक खामोश हूँ जहाँ तक तूफ़ान भी पिघल के रेत बन जाता है....©   



Wednesday, April 1, 2015

मेरी फितरत भी कुछ पत्‍तों सी है

मेरी फितरत भी कुछ पत्‍तों सी है, 

जब भी टूटता हूं, उड़ने लगता हूं ... "कुमार"©