महफ़िल-ए-कुमार
Friday, October 24, 2014
मैं दिए जला रहा हूं .....
अंधेरे की तलवारों से उजाला चीरा नहीं जा सकता...
दिए के जलते ही अंधेरा खाक हो जाता है। राख उससे काली हो सकती है लेकिन फैल नहीं सकती। तुम धुएं उडाते रहो,
मैं दिए जला रहा हूं .....
Friday, September 26, 2014
साँझ
साँझ बन के मत झाकना मुझमे, मै ओस की बूंदों में में हूँ …
पर आँख भी मत बन जाना, निगाहों में नजरिये घुले होते हैं। गर्म हवाओं
से पहले बस मुट्ठी बंद कर लेना , हाँ मोती ऐसे ही बनते हैं। … 'कुमार'©
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