महफ़िल-ए-कुमार
Saturday, August 25, 2012
कोई कह रहा था, जुबान सिली गई हैं यहीं....
टूटे हुए पत्तों की तरह पन्ने बिखरे हैं,
सच की स्याही किसी ने छिड़की थी,
कुछ कटी हुई जीभें भी पड़ी हैं,
गला भी कटा है, आवाज़ आई थी यहीं से,
चंद बूँदें खून की, धागे के साथ पड़ी हैं,
कोई कह रहा था, जुबान सिली गई हैं यहीं..... 'कुमार'
2 comments:
Unknown
November 14, 2013 at 4:38 AM
umda
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Unknown
November 14, 2013 at 4:39 AM
जुबान सिली गई हैं यहीं....
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umda
ReplyDeleteजुबान सिली गई हैं यहीं....
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