जिस्त में फिर वही मुकाम आया,,
धोखे से फिर वही तूफ़ान आया.
आगे बढ़ चले थे छोड़ के रकीब,,
वही "तोहफे" तमाम लाया.
बचा के रक्खूं क्यूँ मुहब्बत दिल में, जब
जिगर ही इस "जंग" में काम आया.
अब चलते हैं तेरे इश्क से आगे,,
खातिब उनका यही पैगाम लाया.
'दिल्ली' से घूम आये हो ज़रूर, जो
लोग कहते हैं, देखो बाद-जुबां आया.
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ReplyDeleteमैटर नहीं दिख रहा.
बहुत अच्छा लिखा, खूब
ReplyDeleteबचा के रक्खूं क्यूँ मुहब्बत दिल में, जब
जिगर ही इस "जंग" में काम आया.