Wednesday, December 29, 2010

....कराहों तो समझूँ

दर्द हो तो आह निकलती ही है,,
दर्द देख तुम कराहों तो समझूँ.

मुद्दा बना के चिल्लाते बहुत देखा,,
मुद्दा जब खुद चिल्लाये तो समझूँ .

आसां है बिसात के मोहरे चलाना,,
मैदां में आ ललकार दो तो समझूँ.

दस्तूर है जमाने का बदलना लोगों,,
तुम खुद को 'तुम' रखो तो समझूँ.

दरिया बड़ा देख कश्ती बदल दी तुमने,,
संग मेरे साहिलों से टकराओ तो समझूँ..... विवेक 

10 comments:

  1. दर्द हो तो आह निकलती ही है,,
    दर्द देख तुम कराहों तो समझूँ.

    अबे तुम तो पूरे ग़ालिब हो गए हो. समझ में नही आता कि आखिर कमेन्ट क्या करूं. बहुत शानदार लिखा है... बहुत शानदार

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  2. ye to yatharth hai wats.................

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  3. मुद्दा बना के चिल्लाते बहुत देखा,,
    मुद्दा जब खुद चिल्लाये तो समझूँ .

    i have seen use of personification many times but this one is awesome. in the sense its like as you have not personified "mudda" but also you have "lived" it from its dead existence.
    mast hai :)

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  4. lajawaab andaaz hai bhaijaan aapka .. antaraatma ko choo gayee ;)

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  5. दस्तूर है जमाने का बदलना लोगों,,
    तुम खुद को 'तुम' रखो तो समझूँ.
    बहुत खूब!

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  6. hiiii

    aap bahot achha likhte hai isme koi shaq nahi...
    bahot hi achha laga aur pasand aaya..
    dard dekha tum karaaho tu samazu...superb

    -chaitali

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  7. दस्तूर है जमाने का बदलना लोगों,,
    तुम खुद को 'तुम' रखो तो समझूँ.

    दरिया बड़ा देख कश्ती बदल दी तुमने,,
    संग मेरे साहिलों से टकराओ तो समझूँ
    विवेक, बहुत खूब........वाकई जो ना बदले वही है इरादों का पक्का....बहुत दिन बाद तुमने कुछ लिखा है....लेकिन हमेशा की तरह सच्चाई को बयाँ किया है....
    .

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  8. tumhari sachhai sachi hai..kumar

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