Wednesday, September 22, 2010

...नज़र टिकाये हो मेरी जुबान पर.

तीर तेरे पास भी रहा, तीर मेरे पास भी रहा,,
मैंने रक्खा जिगर के पार, तूने हमेशा कमान पर.

बड़ी हसीं दिखेगी दुनिया, एक कोशिश कर,,
चढ़ के देख ज़रा अपनी खूबसूरती के गुमान पर.

बदल के रास्ते जितना भी भाग ले तू दूर,,
मिलेगा तो ज़रूर, किसी न किसी मुकाम पर.

दिल को दिया बना यूँ बैठेगा कब तक,,
कहीं आग न लग जाए तेरे इस मकान पर.

आस्तीन बंद रख, इमान बिकता होगा,,
इंसान खरीदने चला है तू किस दूकान पर ?

जब दी आवाज खामोश हो गए थे क्यूँ ?
अब क्या नज़र टिकाये हो मेरी जुबान पर.

मुस्कुरा देता है हर कलाम पर, तू क्या जाने,,
शेर दर्द से टकरा के उतारते हैं दीवान पर.....

8 comments:

  1. तीर तेरे पास भी रहा, तीर मेरे पास भी रहा,,
    मैंने रक्खा जिगर के पार, तूने हमेशा कमान पर.

    ‌‌‌वाह। क्या बात है। गजब की गहराई है आपके शब्दों में। बहुत शानदार ​लिखा है, ​लिखते रहें।
    मेरा ब्लाग भी देखें
    http://www.tikhatadka.blogspot.com/

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  2. जब दी आवाज खामोश हो गए थे क्यूँ ?
    अब क्या नज़र टिकाये हो मेरी जुबान पर.

    मुस्कुरा देता है हर कलाम पर, तू क्या जाने,,
    शेर दर्द से टकरा के उतारते हैं दीवान पर.....!!!
    bahut achcha....waah waah...

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  3. .

    तीर तेरे पास भी रहा, तीर मेरे पास भी रहा,,
    मैंने रक्खा जिगर के पार, तूने हमेशा कमान पर....

    Awesome !

    .

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  4. गालिब का नया दीवान तैयार हो रहा है, इसमें कोई शक नहीं। मिलेंगे किसी न किसी मुकाम पर...वाह क्या बात है???

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  5. Thank you Dr. Divya and Sudheer sir..Zaroor milenge !

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  6. hello vivekji,

    bahot hi achhi likhi hai aapne ye poem.ekdam tikhi. tikhi isliye kaha ki ekdam dil ko chhuti hai:-)

    --chaitali

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  7. kya khub likha hai kumar apaney ;)

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