Friday, September 10, 2010

चश्मदीद मै बन ना पाया.....

छलक गया होता, नज़रों से गिर गया यूँ क्यूँ ?
ऐसा क्या कर गया की आंसू भी ना बन पाया.

हर शक्ल मुजरिम दिखे है जिस तरफ देखे हूँ, क्यूँ ?
मलाल खूब है जेहन में, चश्मदीद मै बन ना पाया.

तेरी फितरत दिल्ली की सियासत सी है क्यूँ ?
कहे हो खूब भेजी मुहब्बत, मैंने कुछ नहीं पाया.

जब भी कहे हूँ अफसाना, अटक जाता हूँ क्यूँ ?
किस्से को खूब कुरेदा, किरदार कोई नहीं पाया.

जब खुद की राह है तो खुद से डरता है क्यूँ ?
चल ज़रा जोर से, सोंच मत क्या खोया-क्या पाया....विवेक

3 comments:

  1. ह्म्म्म, आपने बहुत बढ़िया लिखा है विवेक,
    ""जब खुद की राह है तो खुद से डरता है क्यूँ ?
    चल ज़रा जोर से, सोंच मत क्या खोया-क्या पाया...""

    ♠ ♠ ♠ बहुत असमंजस सी स्थिति का वर्णन किया है,
    पर जो हो गया हमें उस पर सोच के वक़्त जाया नहीं करना चाहिए.....
    काश हम भी आप जैसा अच्छा और बढ़िया लिख पाते....!!!!!

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  2. विवेक भाई, आपने तो गजब कर दिया है. बहुत ही बेहतरीन है आपकी शायरी. मुझे यकीं है के हर कोई पढ़कर खुद पर लिखा गया समझता होगा...

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  3. Thank you Malkhaan... and Rashmi.
    haan Malkhan shachhai sabke liye ek hi hoti hai...kyun ki sanch bhi ek hi hota hai !

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