Wednesday, September 22, 2010

...नज़र टिकाये हो मेरी जुबान पर.

तीर तेरे पास भी रहा, तीर मेरे पास भी रहा,,
मैंने रक्खा जिगर के पार, तूने हमेशा कमान पर.

बड़ी हसीं दिखेगी दुनिया, एक कोशिश कर,,
चढ़ के देख ज़रा अपनी खूबसूरती के गुमान पर.

बदल के रास्ते जितना भी भाग ले तू दूर,,
मिलेगा तो ज़रूर, किसी न किसी मुकाम पर.

दिल को दिया बना यूँ बैठेगा कब तक,,
कहीं आग न लग जाए तेरे इस मकान पर.

आस्तीन बंद रख, इमान बिकता होगा,,
इंसान खरीदने चला है तू किस दूकान पर ?

जब दी आवाज खामोश हो गए थे क्यूँ ?
अब क्या नज़र टिकाये हो मेरी जुबान पर.

मुस्कुरा देता है हर कलाम पर, तू क्या जाने,,
शेर दर्द से टकरा के उतारते हैं दीवान पर.....

Friday, September 10, 2010

चश्मदीद मै बन ना पाया.....

छलक गया होता, नज़रों से गिर गया यूँ क्यूँ ?
ऐसा क्या कर गया की आंसू भी ना बन पाया.

हर शक्ल मुजरिम दिखे है जिस तरफ देखे हूँ, क्यूँ ?
मलाल खूब है जेहन में, चश्मदीद मै बन ना पाया.

तेरी फितरत दिल्ली की सियासत सी है क्यूँ ?
कहे हो खूब भेजी मुहब्बत, मैंने कुछ नहीं पाया.

जब भी कहे हूँ अफसाना, अटक जाता हूँ क्यूँ ?
किस्से को खूब कुरेदा, किरदार कोई नहीं पाया.

जब खुद की राह है तो खुद से डरता है क्यूँ ?
चल ज़रा जोर से, सोंच मत क्या खोया-क्या पाया....विवेक