बातों का अपना जाल है,
बुनते रहते हैं कुछ लोग,
सच के नाम पे, तर्क के नाम पे,
तर्कों के ताने-बाने में खुद को पिरो कर,
सच के प्रकार बताए जाते हैं,
एक मेरा सच और एक तुम्हारा वाला,
ये जाल जानलेवा है,
क्योंकि सच के पहलू नहीं होते,
तर्कों की अपनी औकात होती है,
उसे मरोड़ा-तोड़ा जाता है,
फिर "सच्चाई" पनपती है,
झूठ की नींव से, नफरत-लोभ लपेटे हुए,
फिर खड़ा होता है "सच",
अडिग,
सच का रूप नहीं होता,
ये निर्गुण है, कबीर की तरह.... ©️ (विवेक)