Wednesday, May 13, 2020

सच

बातों का अपना जाल है,
बुनते रहते हैं कुछ लोग,
सच के नाम पे, तर्क के नाम पे,
तर्कों के ताने-बाने में खुद को पिरो कर,
सच के प्रकार बताए जाते हैं,
एक मेरा सच और एक तुम्हारा वाला,
ये जाल जानलेवा है, 
क्योंकि सच के पहलू नहीं होते,
तर्कों की अपनी औकात होती है,
उसे मरोड़ा-तोड़ा जाता है,
फिर "सच्चाई" पनपती है,
झूठ की नींव से, नफरत-लोभ लपेटे हुए,
फिर खड़ा होता है "सच", 
अडिग,
सच का रूप नहीं होता,
ये निर्गुण है, कबीर की तरह.... ©️ (विवेक)

Monday, March 30, 2020

"एकांत"

शोर थम गया है तुम्हारा

सिर्फ मैं ही हूं आसपास मेरे

अंधकार और प्रकाश के कहीं बीच

जहां परछाइयां भी नहीं बनती

इंद्रधनुष भी मिरिचिका नहीं बनाते

समय मौन हो जाता है

असली-नकली से बहुत दूर

शोर-शांति से आगे

एकांत के आनंद में....