महफ़िल-ए-कुमार
Friday, August 2, 2019
उड़ रहा हूं अंदर...
आसमान में फूल नहीं खिलते पर,
सुगंध फिजाओं में घुल कर नीली हो जाती है,
उम्र को मैं चल के नहीं जीता,
ठहराव भी नहीं है मील के पत्थरों पर,
मुस्कुराते हुए उड़ रहा हूं अंदर...और अंदर..."कुमार"
बात इतनी अंदर गई है...
अब उम्र सिलवटों में सिमट गई है,
अभी-अभी जिंदगी लिपट के गई है.
जायका आंखों में तेरे हुस्न का है,
जब से देखा है तबीयत बिगड़ गई है.
रो-रो के उसने नमी इतनी कर ली,
दिल के किवाड़ में लकड़ी जम गई है.
रूह तक छाले ही छाले हैं
यकीनन बात इतनी अंदर गई है.
..."कुमार"
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