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हालात बदल जाते हैं तो सवालात बदल जाते हैं,
जो साथ रहते हैं उनके खयालात बदल जाते हैं.
मिलना गले तो इतिहास की बात हो गई,
अब तो हाथ भी बढाने के अंदाज़ बदल जाते हैं.
रोटी जब भूख को ललचाने लगे बार-बार,
यकीनन माँ-बाप के भी ज़ज्बात बदल जाते हैं.
घूर के ही सही कभी इन आँखों में देख लेना,
नज़रों से भी कई बार अलफ़ाज़ बदल जाते हैं.
पत्थरों से टकरा के मिट्टियाँ लाल नहीं होती 'कुमार',
खून पे खून का रंग चढ़ा निजाम बदल जाते हैं …।

nice lines :)
ReplyDeletetrue lines......
ReplyDeleteमिलना गले तो इतिहास की बात हो गई,
ReplyDeleteअब तो हाथ भी बढाने के अंदाज़ बदल जाते हैं.
उम्दा :)
bhai aapki kavita bahut pasand aayi...jis gahrayi se aapne shabdon mein sachai ko byaan kiya beh dil ko chhoo gaya...aapki kaabliyat pe to hamein pehle se hi naaz hai...sameer
ReplyDeletewah wah wah !
ReplyDeletehmm true
ReplyDeletehmm true
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