Sunday, April 8, 2012

....'रोटी' अब भी उसका सवाल क्यूँ है ?

कुआँ दे दिया पानी ही नहीं, ये हाल क्यूँ है ?

बेहयाई देखिये, पूछते हैं ये परचम लाल क्यूँ है ?

जीने की जुगत में उसने सुबह को शाम कर डाला,
अफ़सोस, 'रोटी' अब भी उसका सवाल क्यूँ है ?


पत्थर को पसीने से पिघला ईमारत खड़ी की थी,

मजदूर ही तो था, उसके मरने पे ये बवाल क्यूँ है ?

भूख से तो कल रात ही टूटा था एक रिश्ता,

कब्र में वो मछली और ऊपर ये जाल क्यूँ है ?

उसने राखों से बटोर ज़िन्दगी उठाई है 'कुमार', अब,

जलो मत कि उसके चेहरे पे ये जलाल क्यूँ है ? .... 



Saturday, April 7, 2012

शाम देखा है खबर बिकते, सुबह अखबार.....

कुछ इस तरह आता है मेरे हिस्से में प्यार,
जैसे बिखरे हुए किस्से में खोया हो किरदार.
 
अब इन कागजों पे भरोसा हो तो कैसे ?
शाम देखा है खबर बिकते, सुबह अखबार.
 
मुंसिफ की दुकान पे भी लगती हैं बोलियाँ.
सुबूत दब गए हैं, जिरह में बिक गया बाज़ार.
 
सजा के दरबार बैठी खामोश क्यूँ है दिल्ली ?
संगीने  खिंच गई हैं, क्या मुकाबिल है सरकार ?
 
सियासी बयानों में उलझा के मुल्क को 'कुमार',
रोज़ लूटा जा रहा है हर शख्स का ऐतबार......