Thursday, December 1, 2011

.....भूख में लिपटे फिर कुछ बच्चे हुए हैं.

जंगलों में हालात क्या ख़ाक अच्छे हुए हैं ?
यहाँ भूख में लिपटे फिर कुछ बच्चे हुए हैं.

जतन कर लो जताने की खुद को जितना,
ये लोग बस रकीबी में ही अच्छे हुए हैं.

रोते हो जिस फांकाकशी पे तुम दिनोरात,
इसी गरीबी को नोंच कई पट्ठे हुए हैं.

जागते रहो नींद में भी "कुमार"
सपने देखे तो ही वो सच्चे हुए हैं.




Thursday, August 4, 2011

मुमकिन नहीं दिल का औंजार होना....

जंगलों, देखा है किस्मत ख़राब होना,
छोटी सी खबर, उसका अख़बार होना.

जिंदा ज़ली हुई लड़की की तस्वीर,
फिर इसी किस्से का बार-बार होना.

भूख, रोटी से ज्यादा है हवस की,
ख़ामोशी, जैसे दिल्ली और सरकार होना.

मोहब्बत में 'जिद्द' का ज़िक्र ऐसा,
कारोबार है कत्ल-ए-ऐतबार होना.

किस-किस का गिला करें 'कुमार'
मुमकिन नहीं दिल का औंजार होना.... कुमार

Tuesday, July 26, 2011

......वही किरदार किस्से में आया है.

फिर वही किरदार किस्से में आया है,
अधूरा प्यार फिर म्रेरे हिस्से में आया है.

अश्क भी कतराते हैं निकलने से अब,
कहते हैं, दिल ही काफ़िर पे आया है.

कब तक रोते रहोगे किस्मत की जानिब,
मान लो लकीरों पे गलत रूह का साया है.

बड़े जातां से पड़ा था जिगर, दिल में,
फिर किसी ने इसे खिलौना बनाया है.

लश्कर एक और गुजरा है इस सरजमीं से,
इसे देख मंदिर सोमनाथ का याद आया है.

'मीर' का दर्द तो हंस भी लेता है 'कुमार',
मेरे तो दर्द को भी कमबख्त रोना ही आया है.....'कुमार'

Thursday, July 14, 2011

'दिल्ली' से घूम आये हो ज़रूर......

जिस्त में फिर वही मुकाम आया,,
धोखे से फिर वही तूफ़ान आया.

आगे बढ़ चले थे छोड़ के रकीब,,
वही   "तोहफे"    तमाम    लाया.

बचा के रक्खूं क्यूँ मुहब्बत दिल में, जब
जिगर ही इस "जंग" में काम आया.

अब चलते हैं तेरे इश्क से आगे,,
खातिब उनका यही पैगाम लाया.

'दिल्ली' से घूम आये हो ज़रूर, जो
लोग कहते हैं, देखो बाद-जुबां आया.

Wednesday, April 6, 2011

मै दिल्ली हूँ.............

वो छेड़ता है साज़-ए-मोहब्बत बार-बार,,
दिल में छाती है याद-ए-नफरत बार-बार.

वो लुटेरा है, लूटता है ऐतबार,,
मै दिल्ली हूँ, लुटता हूँ बार-बार.
...
कर लो सितम हज़ार पर मुझे याद है,,
गौरी और चींटी का चढ़ना बार-बार.

तीरों से कम नहीं तोहमत तेरी मियां,,
चुभती है जिगर में, वो भी बार-बार.

हर बात पे तेरी अशार आते हैं 'कुमार'
सिर्फ हंस देता है वो रो-रो के बार-बार......विवेक

Wednesday, March 30, 2011

इश्क का छींटा पड़ गया,,.

तबीयत पर इश्क का  छींटा  पड़ गया,,
अभी तो यहीं था,  मुसाफिर   बढ़ गया.

अब क्या लगा है फितरत बदलने में हबीब,,
रकीब, मेरे घर की सीढियाँ फिर चढ़ गया.

बड़ी अजीब सी भूख, नफरत संग लिए फिरे है,,
जंगलों में ऐसा एक शख्स सामने  पड़ गया.

उस ओर देख कर भी वो ताकता रह गया,,
संजीदा था पर दोष, दोस्त पे  मढ़ गया.

बड़ी जिद  से  ज़िन्दगी   जी  है  'कुमार'
फिर क्यूँ कहते हो कि तू फिर अड़ गया ?

Monday, January 17, 2011

.....रकीब को 'यार' कर देखा है.

खतरनाक मंज़र बहुत आंक के देखा है,,
कई बार मैंने आईने में झाँक कर देखा है.

नजरिया बदलता रहा लोगों का हर बार,,
जब भी नज़रों में मैंने ताक़  कर देखा है.

भीड़ में हँसना, कहता है खिल-खिला कर,,
रोता है, अकेले में जब भी बात कर देखा है.

फितरत है जमाने की तगाफुल क्या करूँ,,
मैंने भी कभी रकीब को 'यार' कर देखा है.

बढ़ता हूँ 'उस' तरफ बड़ा फूंक-फूंक कर,,
कई बार इससे पहले ऐतबार कर देखा है...विवेक