लिखने बैठा था वो किस्मत, खुद ही खुदा बन कर,,
रोशनाई और कलम ही दे गई दगा, राजदां बनकर.
बचना उसका था आसां, कोई इंसां बन गया होता,,
क्या जरूरत थी उसे नोचने की, यूँ हैवां बनकर.
ज़िन्दगी सड़कों पे सीखी है, उसे चलना न सिखाओ,,
जवाब मांगे फिरे है, रह गया है उलझा 'बयां' बनकर.
तू सज़र गुलाब का है, लिपटा ले कांटे जितना जी करे,,
जीतूँगा मै या फिर तेरे पास उग आऊंगा, घास बनकर.
जब भी भेजे हूँ मै ख़त, जवाब उल्टा ही आता है लोगों,,
खातिब कह गया है, रह जाएगा तू बस 'जुबां' बनकर.
सो गए कई, कई खामोश हो गए, बड़ा अजीब शहर है,,
चर्चा हर जुबां पर है इसकी पर सिर्फ 'बात' बनकर....
लगता है अवतार सिंह पाश की आत्मा आ गई है। बहुत खूब
ReplyDeleteमैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
बम फेंक दो चाहे विश्वविद्यालय पर
बना दो होस्टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मुझे क्या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊंगा
बंगे को ढेर कर दो
संगरूर मिटा डालो
धूल में मिला दो लुधियाना ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी...
दो साल... दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्टर से पूछेंगी
यह कौन-सी जगह है
मुझे बरनाला उतार देना
जहाँ हरे घास का जंगल है
मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूंगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा।
wah sir ! Pash ki is kavita ke liye...
ReplyDeletePaash to samandar hain, mai nala bhi nai.
Dhanyawad...hausalahaafjai ke liye.