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नसीहतें भी चुभने लग जाती हैं नश्तर बनकर,
सरकार जब भी डरती है अवाम को 'बस्तर' बनकर।
अशरफियों में तौल तेरे माँ-बाप ने पाला है ज़रूर,
तेरी रेशमी लिबासों में मैं भी हूँ अस्तर बनकर।
जब भी चीखता हूँ, हलक दरबान बन जाती है,
आवाज़ अब निकल नहीं पाती है अक्सर तनकर।
साथ चलने कि गुज़ारिश, नाकाबलियत नहीं,
अकेला ही निकला हूँ, कई बार लश्कर बनकर।
इन लकीरों कि बंदिशों से डराओ न 'कुमार' को,
लांघ जाउंगा हर दहलीज़ तस्कर बनकर। '… कुमार'
