Sunday, November 10, 2013

नसीहतें भी चुभने लग जाती हैं नश्तर बनकर

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नसीहतें भी चुभने लग जाती हैं नश्तर बनकर,
सरकार जब भी डरती है अवाम को 'बस्तर' बनकर। 

अशरफियों में तौल तेरे माँ-बाप ने पाला है ज़रूर, 
तेरी रेशमी लिबासों में मैं भी हूँ अस्तर बनकर। 

जब भी चीखता हूँ, हलक दरबान बन जाती है, 
आवाज़ अब निकल नहीं पाती है अक्सर तनकर। 

साथ चलने कि गुज़ारिश, नाकाबलियत नहीं, 
अकेला ही निकला हूँ, कई बार लश्कर बनकर। 

इन लकीरों कि बंदिशों से डराओ न 'कुमार' को, 
लांघ  जाउंगा  हर  दहलीज़   तस्कर   बनकर। '… कुमार' 

Monday, August 26, 2013

खयालात बदल जाते हैं...




 हालात बदल जाते हैं तो सवालात बदल जाते हैं,
जो साथ रहते हैं उनके खयालात बदल जाते हैं. 

मिलना गले तो इतिहास की बात हो गई,
अब तो हाथ भी बढाने के अंदाज़ बदल जाते हैं. 

रोटी जब भूख को ललचाने लगे बार-बार,
यकीनन माँ-बाप के भी ज़ज्बात बदल जाते हैं. 

घूर के ही सही कभी इन आँखों में देख लेना, 
नज़रों से भी कई बार अलफ़ाज़ बदल जाते हैं. 

पत्थरों से टकरा के मिट्टियाँ लाल नहीं होती 'कुमार',
खून पे खून का रंग चढ़ा निजाम बदल जाते हैं …।