खतरनाक मंज़र बहुत आंक के देखा है,,
कई बार मैंने आईने में झाँक कर देखा है.
नजरिया बदलता रहा लोगों का हर बार,,
जब भी नज़रों में मैंने ताक़ कर देखा है.
भीड़ में हँसना, कहता है खिल-खिला कर,,
रोता है, अकेले में जब भी बात कर देखा है.
फितरत है जमाने की तगाफुल क्या करूँ,,
मैंने भी कभी रकीब को 'यार' कर देखा है.
बढ़ता हूँ 'उस' तरफ बड़ा फूंक-फूंक कर,,
कई बार इससे पहले ऐतबार कर देखा है...विवेक