दर्द देख तुम कराहों तो समझूँ.
मुद्दा बना के चिल्लाते बहुत देखा,,
मुद्दा जब खुद चिल्लाये तो समझूँ .
आसां है बिसात के मोहरे चलाना,,
मैदां में आ ललकार दो तो समझूँ.
दस्तूर है जमाने का बदलना लोगों,,
तुम खुद को 'तुम' रखो तो समझूँ.
दरिया बड़ा देख कश्ती बदल दी तुमने,,
संग मेरे साहिलों से टकराओ तो समझूँ..... विवेक