Tuesday, August 31, 2010

कुछ खुद से, कुछ मिजाज़.....

कुछ खुद से, कुछ मिजाज़ तो कुछ हालात से,
परेशान इतना है वो,
मील के पत्थर पे बैठ पूछता है कितनी दूर और?

थी उम्मीद तो दामन पकड़ बड़ा तेज़ भागा था,
अब सिर्फ साँसे तेज़ हैं,
कदम बढ़ाये है और पूछे है यहाँ से कितनी देर और?

कोशिश तो पुरजोर की है, हर बार उसने वहां,
दर फिर भी दूर रहा,
अब हर हमदर्द कहता है, लगा ले थोडा जोर और.

वो इस तरफ कभी झांकता क्यूँ नहीं, सबब क्या है,
जब भी दिल खोलता हू,
किवाड़ बंद कर लेता है, कहता है कोई चर्चा कर और... विवेक

Thursday, August 26, 2010

....वो सियासत में डूबा है,

खुश नहीं है नसीब, इम्तिहान बड़ा है,
किस्मत में ये भी नहीं,
गम खूब हो दिल में और खूब रोना आ जाये.

गिरहें खुल रही हैं हर एक साल की यहाँ,
तारीखें भी बे-तरतीब हैं,
डर है, कही कोई फिर उम्र ना छुपा जाए.

आग बहुत है, भट्ठी सी दिख रही है देखो,
दिल अंगार बना है,
और सोंचता है, फिर यहाँ धुआं ना छा जाए .

कोई भूख से मर गया, वो बे-फिक्र जीता है,
सियासत में डूबा है ज़रूर,
किसी नींद में नहीं कि कोई आ के हिला जाए.....विवेक  

Saturday, August 21, 2010

.....रहेंगे 'आईने' की तरह.

खुद ही पूछ लेना सवाल,
खुद ही जवाब देना,
हम तो रहेंगे 'आईने' की तरह.

तेरी मुस्कराहट, हंसी नज़र,
सब रखुंगा संभाल के,
बचपन में पढ़े 'कायदे' की तरह.

भूल जा तूने रोया था कभी,
अब सिर्फ हंस यहाँ,
बिल्कुल किसी 'आदत' की तरह.

तू अज़ीज़ है बड़ा हमको,
याद रखुंगा ज़िस्त-भर,
जी हाँ, अपने 'दस्तखत' की तरह...विवेक

Saturday, August 14, 2010

.....जब सच कहीं निकलता होगा !

आँखे फट जाती होंगी जब सच कहीं निकलता होगा,,
झूठा होगा वो शख्स जो आँखे चुरा के चलता होगा.

तल्ख़ है चेहरा तेरा, आँखे बनी हैं यूँ अंगार क्यूँ ?
भट्ठी झूठ की हो तो सच इसी कदर जलता होगा.

कई हादसों की चश्मदीद, ये सड़क झूठी होगी जरूर,,
देखो यहीं-कहीं कोने में पड़ा हुआ सच गलता होगा.

इन लड़खड़ाते क़दमों से कहाँ तक जाओगे? देखो उसे,,
वो ऊँचा चढ़ा है, यक़ीनन गिर-गिर के संभलता होगा.

इतराता था बड़ा अपने हर एक झूठ पे वो लोगों,,
सच की नज़र ऐसी पड़ी, अब सिर्फ हाथ मलता होगा.....

Sunday, August 8, 2010

....उग आऊंगा घांस बनकर.

लिखने बैठा था वो किस्मत, खुद ही खुदा बन कर,,
रोशनाई और कलम ही दे गई दगा, राजदां बनकर.

बचना उसका था आसां, कोई इंसां बन गया होता,,
क्या जरूरत थी उसे नोचने की, यूँ हैवां बनकर.

ज़िन्दगी सड़कों पे सीखी है, उसे चलना न सिखाओ,,
जवाब मांगे फिरे है, रह गया है उलझा 'बयां' बनकर.

तू सज़र गुलाब का है, लिपटा ले कांटे जितना जी करे,,
जीतूँगा मै या फिर तेरे पास उग आऊंगा, घास बनकर.

जब भी भेजे हूँ मै ख़त, जवाब उल्टा ही आता है लोगों,,
खातिब कह गया है, रह जाएगा तू बस 'जुबां' बनकर.

सो गए कई, कई खामोश हो गए, बड़ा अजीब शहर है,,
चर्चा हर जुबां पर है इसकी पर सिर्फ 'बात' बनकर....