कुछ खुद से, कुछ मिजाज़ तो कुछ हालात से,
परेशान इतना है वो,
मील के पत्थर पे बैठ पूछता है कितनी दूर और?
थी उम्मीद तो दामन पकड़ बड़ा तेज़ भागा था,
अब सिर्फ साँसे तेज़ हैं,
कदम बढ़ाये है और पूछे है यहाँ से कितनी देर और?
कोशिश तो पुरजोर की है, हर बार उसने वहां,
दर फिर भी दूर रहा,
अब हर हमदर्द कहता है, लगा ले थोडा जोर और.परेशान इतना है वो,
मील के पत्थर पे बैठ पूछता है कितनी दूर और?
थी उम्मीद तो दामन पकड़ बड़ा तेज़ भागा था,
अब सिर्फ साँसे तेज़ हैं,
कदम बढ़ाये है और पूछे है यहाँ से कितनी देर और?
कोशिश तो पुरजोर की है, हर बार उसने वहां,
दर फिर भी दूर रहा,
वो इस तरफ कभी झांकता क्यूँ नहीं, सबब क्या है,
जब भी दिल खोलता हू,
किवाड़ बंद कर लेता है, कहता है कोई चर्चा कर और... विवेक